कर्नाटक

ओबीसी गणना में बिखर सकते हैं आंकड़े परमेश्वर ने केंद्र से जताई चिंता

Kavita2
12 Sept 2026 11:34 AM IST
ओबीसी गणना में बिखर सकते हैं आंकड़े परमेश्वर ने केंद्र से जताई चिंता
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बेंगलुरु। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने राष्ट्रीय जनगणना के दौरान जातियों की गणना के लिए प्रस्तावित ‘ओपन-एंडेड’ प्रक्रिया पर चिंता जताई है। उन्होंने शुक्रवार को केंद्र सरकार से इस पद्धति पर पुनर्विचार करने और वैज्ञानिक रूप से मानकीकृत राष्ट्रीय जाति जनगणना कराने की अपील की। परमेश्वर ने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी और दूसरे समुदायों की जानकारी दर्ज करते समय एक स्पष्ट, मानकीकृत तथा सत्यापित जाति ढांचा होना आवश्यक है। उनके अनुसार, ऐसी व्यवस्था के अभाव में आंकड़ों के संकलन और वर्गीकरण में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

परमेश्वर की मुख्य आपत्ति जातियों की जानकारी दर्ज करने के तरीके को लेकर है। ‘ओपन-एंडेड’ व्यवस्था में उत्तरदाता अपनी जाति का नाम बताते हैं और उसे दर्ज किया जाता है। इसमें पहले से निर्धारित विकल्पों वाली सूची से नाम चुनने की व्यवस्था अलग होती है। उपमुख्यमंत्री का कहना है कि बिना मानकीकरण के एक ही समुदाय से संबंधित जानकारी अलग-अलग प्रविष्टियों में बंट सकती है। इससे गणना का उद्देश्य प्रभावित होने और समुदायों की वास्तविक स्थिति समझने में कठिनाई आने की आशंका है।

उन्होंने केंद्र से वैज्ञानिक रूप से मानकीकृत राष्ट्रीय जाति सूची तैयार करने का आग्रह किया है। इस मांग में सभी राज्यों की विविधता और आवश्यकताओं को ध्यान में रखने का विचार शामिल है। परमेश्वर का तर्क है कि जानकारी एकत्र करने का ढांचा पहले स्पष्ट होना चाहिए, ताकि परिणामों का विश्लेषण विश्वसनीय तरीके से किया जा सके। उनकी अपील जाति गणना की प्रक्रिया को मजबूत बनाने और समुदायों से संबंधित आंकड़ों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू नामों की विविधता है। किसी समुदाय का नाम अलग भाषाओं, स्थानीय बोलियों अथवा वर्तनी में अलग तरीके से लिखा जा सकता है। आंकड़ा संकलन के दृष्टिकोण से ऐसी प्रविष्टियों को समझना और उनका सही वर्गीकरण करना आवश्यक होता है। उदाहरण के तौर पर, केवल वर्तनी का अंतर होने पर दो प्रविष्टियों को अलग समुदाय मान लेना गलत निष्कर्ष पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, मिलते-जुलते नाम वाले अलग समुदायों को एक मान लेना भी सटीकता को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए मानकीकरण का प्रश्न केवल नामों की एक सूची बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें यह स्पष्ट करना भी शामिल है कि स्थानीय नाम, वैकल्पिक नाम और उपसमुदायों की जानकारी कैसे दर्ज तथा व्यवस्थित की जाएगी। यह प्रक्रिया की व्याख्या है; परमेश्वर के बयान में किसी विशेष समुदाय का उदाहरण नहीं दिया गया है। उनकी चिंता का व्यापक अर्थ यही है कि दर्ज की गई जानकारी को समझने के लिए साझा नियम और सत्यापन का आधार होना चाहिए।

ओपन-एंडेड पद्धति पर चर्चा अन्य राज्यों में भी सामने आई है। तमिलनाडु विधानसभा ने हाल में केंद्र से जाति संबंधी जानकारी दर्ज करने के लिए ‘ओपन कॉलम’ व्यवस्था छोड़ने और अधिसूचित जातियों की पहले से उपलब्ध मानकीकृत सूची अपनाने का आग्रह किया था। वहां भी मुक्त प्रविष्टियों से असंगत जानकारी दर्ज होने की आशंका व्यक्त की गई। इससे स्पष्ट है कि जाति गणना की पद्धति को लेकर बहस केवल एक राज्य के बयान तक सीमित नहीं है।

जाति संबंधी आंकड़ों की उपयोगिता उनके सही संकलन और व्याख्या पर निर्भर करती है। यदि जानकारी स्पष्ट और तुलनीय हो, तो विभिन्न समुदायों की स्थिति का अध्ययन करने में सहायता मिल सकती है। लेकिन नामों के वर्गीकरण में अस्पष्टता होने पर परिणामों को समझना कठिन हो सकता है। इसी वजह से गणना की शुरुआत से पहले पद्धति, रिकॉर्डिंग और बाद के विश्लेषण के बीच तालमेल महत्वपूर्ण है। परमेश्वर की मांग इसी तैयारी को अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में है।

प्रक्रिया में गणनाकर्मियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। उत्तरदाता की बात सही ढंग से दर्ज करना और निर्धारित निर्देशों का पालन करना आंकड़ों की गुणवत्ता से जुड़ा है। जहां नाम या वर्गीकरण को लेकर अस्पष्टता हो, वहां स्पष्ट दिशानिर्देश उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, किसी अतिरिक्त सत्यापन या वर्गीकरण व्यवस्था को लागू किए जाने की घोषणा उपलब्ध बयान में नहीं है। फिलहाल उपमुख्यमंत्री ने ऐसी वैज्ञानिक और मानकीकृत व्यवस्था अपनाने की जरूरत रखी है।

इस मुद्दे पर चिंता और अंतिम निष्कर्ष के बीच अंतर बनाए रखना भी आवश्यक है। परमेश्वर ने प्रस्तावित प्रक्रिया से समस्याएं पैदा होने की आशंका जताई है। इसे पहले से साबित हो चुकी त्रुटि या तैयार जनगणना परिणामों में गड़बड़ी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। उनकी अपील संभावित कठिनाइयों को गणना से पहले संबोधित करने की है। केंद्र की ओर से इस विशेष बयान पर प्रतिक्रिया उपलब्ध विवरण में शामिल नहीं है।

परमेश्वर के बयान के बाद राष्ट्रीय जाति जनगणना की तकनीकी तैयारी और आंकड़ों की विश्वसनीयता का प्रश्न फिर सामने आया है। उन्होंने केंद्र से ओपन-एंडेड पद्धति की समीक्षा और राज्यों की विविधता के अनुरूप मानकीकृत ढांचा बनाने का आग्रह किया है। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित प्रक्रिया में नाम दर्ज करने, वर्गीकरण और सत्यापन के लिए क्या निर्देश तय किए जाते हैं। इस बहस का केंद्र ऐसी गणना व्यवस्था तैयार करना है, जिससे समुदायों की जानकारी स्पष्ट, संगत और उपयोगी रूप में सामने आए।

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